VIVEK KUMAR SINGH

TSO @ Hindustan Unilever Ltd. Lucknow U.P.

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Posted by [email protected] on July 6, 2013 at 6:00 AM

इशरत जहां मामले ने कई अहम सवाल उठाए हैं। कुछ ऐसे सवाल हैं जो कांग्रेस और बीजेपी जैसी पार्टियां तथा सीबीआई और आईबी जैसी एजेंसियां उठा रही हैं। मीडिया भी इन सवालों को प्रमुखता से उठा रहा है। मगर, कुछ ऐसे सवाल भी इस कांड ने उठाए हैं जिन पर चर्चा ना के बराबर हो रही है।

 

एक प्रमुख सवाल इस कांड पर आ रही प्रतिक्रियाओं से उभरता है। इस कांड की कुछ बातें तो अब शीशे की तरह साफ हैं। इसमें संदेह की कोई गुंजाइश नहीं रह गई है कि इशरत जहां एनकाउंटर फर्जी था। इसके बावजूद राजनीतिक पार्टियां ही नहीं, हमारे आसपास मौजूद लोगों का भी एक बड़ा हिस्सा बहस को उस तरफ ले जाना चाहता है कि आखिर वे थे तो आतंकवादी ही (हालांकि अभी इस बात की जांच होनी बाकी है कि उनमें से कितने और किस रूप में और किस हद तक आतंकवाद से जुड़े थे)।

 

अगर गौर किया जाए तो आतंकवाद के प्रति इन लोगों की इस घनी नफरत के पीछे जाने-अनजाने इस तथ्य की भी अहम भूमिका है कि एनकाउंटर का शिकार हुए ये कथित आतंकवादी मुस्लिम समुदाय से थे। आप ध्यान दें कि ऐसे ही आतंकवाद का आरोप झेल रही साध्वी प्रज्ञा और उनके सहयोगियों का जिक्र आने पर ये लोग इस तरह घृणा से नहीं भर उठते। वहां उनकी दलीलों की दिशा यह होती है कि अभी तक उन पर आरोप साबित नहीं हुए हैं।

 

लेकिन, यहां मसला यह नहीं है कि इशरत और साध्वी प्रज्ञा में से कौन कितना सही या गलत है। सवाल यहां यह है कि आखिर वे कौन सी चीजें हैं जो हमारे आपके आसपास मौजूद सामान्य इंसानों को भी सामान्य इंसानी दृष्टि से वंचित कर देती हैं। उन्हें अच्छा-भला इंसान नहीं दिखता, उसकी दुख-तकलीफ नहीं दिखती, क्रूरता नहीं दिखती, नाइंसाफी नहीं दिखती... लेकिन सामने वाले का मजहब दिख जाता है। बाकी सारी बातें जाने-अनजाने उसी एक तथ्य से निर्देशित होने लगती हैं।

 

और ऐसा सिर्फ इसी एक मामले में नहीं है। अगर महाराष्ट्र के ही मामले में शिवसेना और एमएनएस की राजनीति की बात करें तो वहां भी पूरी तस्वीर ऐसे ही पल भर में बदल जाती है। सारी बातें दरकिनार हो जाती हैं और लोगों को दिखता है तो बस यह कि सामने वाला मराठी है या परप्रांतीय। मजहब का स्थान वहां क्षेत्र ले लेता है।

 

ऐसे ही दूसरे कई कारक हम अपने आसपास की घटनाओं के जरिए खोज सकते हैं जो इंसान के अंदर की इंसानी दृष्टि को धूमिल कर देते हैं। यानी उसके अंदर की इंसानियत को खत्म भले न कर पाएं, कम जरूर कर देते हैं।

 

मगर इससे भी बड़ा एक और सवाल इस कांड ने खड़ा किया है। वह यह कि किसी राजनीतिक दल को पसंद या नापसंद करने का हमारा आधार क्या होना चाहिए? बतौर वोटर हम अमूमन यह देखते हैं कि किसी पार्टी के नेताओं का व्यक्तित्व कैसा है, वह देखने में, बातचीत में कैसे हैं, वह निजी तौर पर ईमानदार हैं या नहीं। आंध्र में तेलंगाना, महाराष्ट्र में परप्रांतीय जैसा कोई बड़ा मसला उस वक्त हमारे लिए अहम रहा तो हम उस मसले पर पार्टी की राय देखते हैं (वैसे अमूमन यह क्षेत्रीय दलों के मामलों में ही होता है), वरना नेताओं के बारे में जो हमारी निजी राय बनती है उसी आधार पर हम पार्टियों को पसंद या नपसंद करते हैं।

 

इशरत कांड ने हमें यह महसूस करने का अच्छा मौका दिया है कि नेताओं की निजी बेईमानी-ईमानदारी का सवाल उतना बड़ा नहीं है जितना बड़ा पार्टी के वैचारिक दायरे का सवाल है। कोई भी पार्टी या संगठन अपने लिए जो मूल तर्क तय करता है और अपना जो वैचारिक दायरा तैयार करता है उसके पार जाने की कूवत किसी नेता में नहीं होती। उसके अंदर ऊटपटांग हरकतें करते हुए वह थोड़ी देर को अपनी प्रतिकूल छवि बना सकता है (हालांकि उसका भी मकसद पार्टी या संगठन को फायदा पहुंचाना ही होता है), लेकिन सही मायनों में वह इस दायरे को लांघ नहीं सकता। इसके लिए उसे वह संगठन छोड़ना पड़ेगा।

 

यही वजह है कि आडवाणी जैसा नेता भी जिन्ना की तारीफ करने के बाद कभी पार्टी में पुराना स्थान नहीं हासिल कर पाया। यही वजह रही कि वाजपेयी जैसा नेता भी कभी साफ-साफ नहीं कह पाया कि बाबरी मस्जिद तोड़ना इस देश के संविधान की मूल भावनाओं का उल्लंघन था और सत्ता का दावा करने वाले किसी राजनीतिक दल के लिए यह बात शर्म से डूब मरने लायक थी कि उसके नेताओं की अगुवाई में किसी भीड़ ने यह दुष्कृत्य किया। और यही वजह है कि आज भी बीजेपी का कोई नेता खुलकर यह नहीं कह पा रहा कि इशरत के परिवार को भी इंसाफ पाने का पूरा हक है और एनकाउंटर फर्जी था तो उसकी निष्पक्ष जांच करके सभी दोषियों को कानून के मुताबिक सजा सुनिश्चित की जानी चाहिए।

 

मगर यहां नेता तो दूर रहे, बीजेपी के समर्थक भी ऐसी मांग जबान पर नहीं ला रहे। शायद उन्हें भी इस बात का पूरा-पूरा एहसास है कि अगर जांच सही ढंग से हुई तो उनके वे नेता फंसेंगे जिनसे उन्होंने सारी उम्मीदें लगा रखी हैं। वे यह नहीं समझ रहे कि अगर हम किसी से झूठी उम्मीद पाल लें तो यह सामने वाले की नहीं बल्कि हमारी गलती होती है। इसलिए अपने हक में यह अच्छा है कि समय रहते झूठी उम्मीद से छुटकारा पा लें। जो नेता एक प्रदेश की सत्ता में रहते हुए अपने नागरिकों को इंसाफ नहीं दे पाए, अपनी प्रशासनिक लापरवाही की सजा सैकड़ों बेकसूर नागरिकों को भुगतने दे। उसके लिए माफी तक मांगना अपनी शान के खिलाफ समझे वह देश की सत्ता पाने के बाद नागरिकों के साथ इंसाफ करेगा यह उम्मीद एक राष्ट्र के रूप में हम सबके लिए कितनी खतरनाक हो सकती है, इसका एहसास हम जितनी जल्दी कर लें उतना अच्छा।

 

Categories: Latest, Lutoo Desh Ko

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