VIVEK KUMAR SINGH

TSO @ Hindustan Unilever Ltd. Lucknow U.P.

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The Beauty of MAtheMazic

Posted by VIVEK KUMAR SINGH on October 17, 2013 at 10:50 AM Comments comments (0)

The Beauty of MAtheMazic

1 x 8 + 1 = 9

12 x 8 + 2 = 98

123 x 8 + 3 = 987

1234 x 8 + 4 = 9876

12345 x 8 + 5 = 98765

123456 x 8 + 6 = 987654

1234567 x 8 + 7 = 9876543

12345678 x 8 + 8 = 98765432

123456789 x 8 + 9 = 987654321

 

1 x 9 + 2 = 11

12 x 9 + 3 = 111

123 x 9 + 4 = 1111

1234 x 9 + 5 = 11111

12345 x 9 + 6 = 111111

123456 x 9 + 7 = 1111111

1234567 x 9 + 8 = 11111111

12345678 x 9 + 9 = 111111111

123456789 x 9 +10= 1111111111

 

9 x 9 + 7 = 88

98 x 9 + 6 = 888

987 x 9 + 5 = 8888

9876 x 9 + 4 = 88888

98765 x 9 + 3 = 888888

987654 x 9 + 2 = 8888888

9876543 x 9 + 1 = 88888888

98765432 x 9 + 0 = 888888888

 

Brilliant, isn't it?

And finally, take a look at this symmetry:

 

1 x 1 = 1

11 x 11 = 121

111 x 111 = 12321

1111 x 1111 = 1234321

11111 x 11111 = 123454321

111111 x 111111 = 12345654321

1111111 x 1111111 = 1234567654321

11111111 x 11111111 = 123456787654321

111111111 x 111111111=123456789 87654321

 

Desh Se kya kahenge Manmohan

Posted by VIVEK KUMAR SINGH on October 4, 2013 at 3:10 AM Comments comments (0)

कांग्रेस एकनिष्ठ भक्ति की पार्टी है। यहां नेता के प्रति निष्ठा सबसे बड़ा सिद्धांत है। मनमोहन सिंह को यह बात समझ में आ गई होगी। ऐसा नहीं है कि उन्हें यह पता नहीं था। हां, सत्ता के नए केंद्र की स्थापना उनकी छवि और प्रतिष्ठा की कीमत पर होगी शायद इसकी उम्मीद उन्हें नहीं रही होगी। प्रधानमंत्री पद की गरिमा को ठेस पहुंचने से परेशान लोगों की श्रेणी में और जो भी हों डॉ. मनमोहन सिंह नहीं हैं। उन्हीं के मुताबिक उन्होंने बहुत ऊंच-नीच देखी है। अमेरिका से लौटते हुए अपने विशेष विमान में मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा कि वह देखेंगे कि हवा का रुख किस तरफ है। सही बात है, प्रधानमंत्री की राजनीति का यह मूल मंत्र है। हवा का रुख देखकर न चले होते तो बिना किसी जनाधार के नौ साल तक प्रधानमंत्री कैसे रहते। 1इस पूरे घटनाक्रम से मनमोहन सिंह ने एक बार फिर साबित किया है कि उनके लिए आत्मसम्मान पद से बड़ा नहीं है। जो नहीं जानते वे जान लें कि राजनीति में वह अपना आत्मसम्मान बचाने नहीं, कुछ हासिल करने आए थे। उन्होंने देखा है कि 1991 में आत्मसम्मान बचाकर चंद्रशेखर सत्ता से हमेशा के लिए बाहर हो गए। उनकी यह सोच ही उनके लिए तीसरे कार्यकाल का दरवाजा खुला रखेगी, इसे वह बखूबी जानते हैं। दागी जनप्रतिनिधियों को बचाने वाला अध्यादेश कानून बन जाए या फाड़कर फेंक दिया जाए उनकी बला से। शुक्रवार को राहुल गांधी ने जब प्रधानमंत्री और उनकी कैबिनेट के खिलाफ मोर्चा खोला उसी दिन से सबको पता है कि इस लड़ाई में जीत किसकी होगी। फैसला जीत-हार के तरीके के बारे में होना था। बुधवार को राहुल गांधी प्रधानमंत्री से मिले तो प्रधानमंत्री समझ गए कि हवा का रुख किस ओर है।

 

प्रधानमंत्री अकेले हैं। जो अपनी मदद के लिए तैयार न हो उसकी मदद करने कौन आएगा। उसके बाद कांग्रेस कोर ग्रुप की बैठक हुई। उसमें वही तय हुआ जो राहुल गांधी चाहते थे। उस बैठक में प्रधानमंत्री भी मौजूद थे। वह अध्यादेश लाने के लिए हुई कोर ग्रुप की बैठक में भी पार्टी की राय से सहमत थे और इसे वापस लेने के फैसले से भी। आखिर वह पार्टी के अनुशासित सिपाही जो हैं।1कांग्रेस पार्टी और प्रधानमंत्री के मंत्रिमंडल के सहयोगी भले ही न पूछें पर देश उनसे एक सवाल का जवाब जरूर जानना चाहेगा कि इस अध्यादेश पर उनकी कोई राय है कि नहीं। वह देश से क्या कहेंगे कि जिस कानून को पहले विधेयक और दूसरी बार अध्यादेश के रूप में उनके मंत्रिमंडल ने पास किया उसके बारे में देश की जनता क्या सोचती है यह उन्हें पता नहीं था। या उन्हें इस बात का पता नहीं चला कि कांग्रेस में सत्ता का केंद्र खिसक गया है। अब उनके एक नहीं दो बॉस हैं। वैसे उन्होंने बिना किसी विरोध के इस स्थिति को भी स्वीकार कर लिया है। मनमोहन सिंह मान-अपमान से ऊपर उठ चुके हैं। मान की उन्हें कामना नहीं और अपमान को उन्होंने अपना प्रारब्ध मान लिया है।

 

राहुल गांधी ने दागियों को बचाने वाले अध्यादेश के बारे में जो कुछ कहा वह प्रधानमंत्री पद की गरिमा को ठेस पहुंचाने तक ही सीमित नहीं है। अध्यादेश के बारे में प्रेस क्लब में बोलने से पहले उन्होंने अपनी पार्टी के मीडिया प्रभारी के बारे में जो कहा वह उनकी कार्यशैली और सोच को दर्शाता है। उन्होंने अजय माकन से पूछा कि क्या हो रहा है। अजय माकन ने बता दिया। राहुल गांधी ने तिरस्कार के अंदाज में कहा कि ये मुङो पार्टी की लाइन समझा रहे थे। जैसे पार्टी की लाइन समझाना कोई अपराध हो। इससे यह ध्वनि निकलती है कि पार्टी की लाइन वह होगी जो राहुल गांधी बोलेंगे, वह नहीं जो पार्टी ने तय किया है। कांग्रेस इस समय जिस चक्रव्यूह में फंसी है, उसकी रचना 2009 के लोकसभा चुनाव के बाद ही हो गई थी। चुनाव के बाद कांग्रेस में नेतृत्व का पीढ़ी परिवर्तन होना था। पार्टी और सरकार राहुल गांधी और उनके नए साथियों की कमान में चलनी थी।

 

चुनाव नतीजे आने के बाद से ही राहुल गांधी की भूमिका को लेकर चर्चाएं होने लगी थीं। वह पहले सरकार में जिम्मेदारी संभालेंगे या पार्टी में। सरकार में जाने की बात आई तो कहा गया कि गांधी परिवार का कोई नेता किसी के मातहत काम नहीं करता। सो राहुल गांधी सरकार में जाएंगे तो प्रधानमंत्री के ही पद पर। इसके लिए इंतजार था उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव का। कांग्रेस को उम्मीद थी कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में वह किंग नहीं तो किंग मेकर तो बनेगी ही। राहुल गांधी के नेतृत्व के लिए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजे अब तक के सबसे बड़े राजनीतिक सदमे की तरह आए।1अब सवाल है कि क्या कांग्रेस में राहुल गांधी का राज्याभिषेक पुरानी पीढ़ी के नेताओं के आत्मसम्मान की कीमत पर होगा। यह राहुल गांधी को तय करना है। राहुल गांधी की नजर में अगर अध्यादेश बकवास है तो कैबिनेट में बैठे कांग्रेस के वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं के बारे में उनकी क्या राय है। इस समस्या का दूसरा पहलू है सहयोगी दलों का। राहुल गांधी संप्रग के सहयोगी दलों को क्या संदेश देना चाहते हैं। उनके रवैये से अभी जो संदेश गया है वह तो यही है कि उन्हें सहयोगियों की परवाह नहीं है। जिस मुद्दे पर उन्होंने राय बना ली है उसके बारे में उन्हें सहयोगी दलों की राय की कोई चिंता नहीं है। तीन सहयोगी दल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, नेशनल कांफ्रेंस और समाजवादी पार्टी राहुल गांधी के तौर-तरीके से सार्वजनिक तौर पर असंतोष जाहिर कर चुके हैं। फारूख अब्दुल्ला कह रहे हैं कि राहुल गांधी को गलत सलाह दी गई है। डीपी त्रिपाठी कह रहे हैं कि हम कांग्रेस के सहयोगी हैं, अनुयायी नहीं। समाजवादी पार्टी बोल रही है कि वह अध्यादेश का समर्थन कर रही है। राहुल गांधी को सपनों की दुनिया से वास्तविकता की दुनिया में लौट आना चाहिए। यह कांग्रेस के विराट जनाधार का दौर नहीं है। यह गठबंधन की राजनीति का दौर है। राहुल गांधी अभी तक वोट दिलाने वाले नेता के तौर पर अपनी साख कायम नहीं कर पाए हैं। चुनाव में जिताकर लाने की क्षमता ही इस परिवार के तिलस्म को कायम रखे हुए है। गांधी-नेहरू परिवार का यह तिलस्म जिस दिन टूट जाएगा, उस दिन वीटो का अधिकार भी खत्म हो जाएगा।

 

Abhi Aur Rulaayege Mahgaaye

Posted by VIVEK KUMAR SINGH on October 4, 2013 at 2:55 AM Comments comments (0)

बाजार में मंहगाई घटने का नाम नहीं ले रही है, पर महंगाई और बढ़ने के कारण बढ़ते जा रहे हैं. सरकार महंगाई कम होने के प्रयासों के दावे करती है कि महंगाई बढ़ने का एक और नया कारण सामने आकर सरकारी दावों की पोल खोल देता है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर के मुकाबले रुपए का मूल्य घटता जा रहा है. अगर यही हाल रहा तो जो थोड़ी बहुत मंहगाई घटने के आसार दिख रहे थे, वह फिर से बढ़ जाएगी. कैसे? जरा इधर गौर कीजिए.

 

rupee डॉलर के मुकाबले रुपए की लगातार घटती यह कीमत अब तक की सबसे बड़ी गिरावट है. विशेषज्ञों की मानें आने वाले दिनों में इसके और गिरने के आसार हैं. 1966 से पहले तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में पाउंड में मापा जाने वाला रुपया जब 1966 से डॉलर में मापा जाने लगा तो 1 डॉलर के मुकाबले इसकी कीमत थी मात्र 7.5 रुपए. उस वक्त महंगाई भी इतनी थी. आप 10 रुपए में कई सामान ले आते. आज अंतरराष्ट्रीय बाजार में 1 डॉलर के मुकाबले इसकी कीमत है 63-64 रुपए. आज महंगाई इतनी बढ़ चुकी है कि 10 रुपए में एक किलोग्राम तो क्या, शायद आधा किलोग्राम सब्जी भी न आए. अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर के मुकाबले रुपए का घटता मूल्य चिंतित करने वाला है.

 

क्यों गिरता है रुपया?

 

कमजोर वैश्विक रुख और आयातकों द्वारा डॉलर की मांग बढ़ने से रुपये के मूल्य में गिरावट आती है. अमेरिका में नए आर्थिक आंकड़ों को लागू किए जाने के बाद यह गिरावट और बढ़ रही है, रुकने का नाम नहीं ले रही. लगातार पांच सप्ताह से यह स्थिति संभलने की बजाय और बदतर होती जा रही है. पर इसकी मुख्य कारण आयात-निर्यात के तत्वों में छुपा है. देश में ज्यादा आयात करने से विदेशी संस्थागत निवेशकों द्वारा डॉलर बाहर भेजने से उसकी मांग बढ़ती है और निर्यातों के बढ़ने और विदेशी निवेशकों द्वारा विदेशी मुद्रा लाए जाने से डॉलरों की पूर्ति बढ़ती है. ऐसे में जब भी आयातक ज्यादा आयात करते हैं या विदेशी निवेशक डॉलर बाहर भेजते हैं तो स्वाभाविक तौर पर रुपया कमजोर होता है यानी प्रत्येक डॉलर के लिए अब ज्यादा रुपये देने पड़ते हैं.

 

गिरता रुपया बढ़ाएगा महंगाई

 

अंतरराष्ट्रीय बाजार में रुपए की घटती कीमतें घरेलू बाजार में महंगाई का बड़ा सबब हैं. घरेलू बाजार में इससे तेल, पेट्रोल की कीमतों में बढ़त की आशंका बढ़ जाती है. आप सोचेंगे रुपए के मूल्य से पेट्रोल, तेल की कीमतों का क्या वास्ता? पर है. भारत अपनी कुल जरूरत के 80 प्रतिशत तेल के लिए आयात पर निर्भर है. इसके अलावे एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में ईरान के अलावे बाकी सभी देश डॉलर में व्यापार करते हैं. ईरान ही एकमात्र देश है जो तेल व्यापार रुपयों के मूल्य में करता है. पर भारत की विडंबना देखो कि अमेरिका के दबाव में यह ईरान से कच्चे तेल के आयात में बहुत अधिक कमी कर चुका है. इस प्रकार अन्य देशों पर कच्चे तेल के निर्यात के लिए भारत की निर्भरता बढ़ी है.

 

1960 के बाद से भारत में कच्चे तेल की मांग में भी बहुत वृद्धि हुई है. इस प्रकार डॉलर के मुकाबले रुपए का मूल्य घटने से तेल के आयात में सरकार को पहले की तुलना में अधिक रुपए खर्च करने पड़ेंगे. इससे जाहिर है घरेलू बाजार में भी तेल और पेट्रोलियम उत्पादों का मूल्य बढ़ने की आशंका बनी रहेगी क्योंकि सरकारी घाटे की क्षति पूर्ति के लिए सरकार के पास यही विकल्प बचता है. इसके अलावे आयातों पर भी कर बढ़ेगा. इससे छोटे आयातकों के व्यापार को नुकसान पहुंचेगा. इसका सीधा असर घरेलू बाजार में उत्पादों के मूल्य वृद्धि के रूप में दिखेगा.

 

किसे होगा फायदा?

 

 

यूं तो किसी भी देश की संपूर्ण अर्थव्यवस्था के लिए उसकी करेंसी का मूल्य गिरना कभी भी फायदेमंद नहीं हो सकता. विभिन्न आयामों पर यह स्थिति देश की अर्थव्यवस्था को तोड़ने का काम करती है. महंगाई बढ़ने से आम जनता को सीधे तौर भी इसके दुष्प्रभावों से रूबरू होना पड़ता है. फिर भी कुछ ऐसे लोग हैं जिन्हें इससे लाभ पहुंचता है, जैसे; रिजर्व बैंक और वैसे आम भारतीय जिनके रिश्तेदार विदेशों में रहते हैं. रिजर्व बैंक सोने के आयात पर कर बढ़ा सकता है. इसके अतिरिक्त अन्य आयात-निर्यात की वस्तुओं पर कर लगाने से रिजर्व बैंक को लाभ होगा. इसके अलावे जिन आम भारतीयों के कमाऊ परिजन विदेश में हैं, उन्हें भी डॉलर एक्सचेंज करवाने पर उसके मुकाबले ज्यादा रुपया मिलेगा.



Is It an End For RJD in Bihar

Posted by VIVEK KUMAR SINGH on September 30, 2013 at 8:35 AM Comments comments (0)

17 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद सीबीआई कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए चारा घोटाले से जुड़े मामले में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री तथा राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव और जगन्नाथ मिश्र समेत 45 दोषियों में से 38 को जेल भेज दिया है। हालांकि अभी सजा का ऐलान तो नहीं किया गया है लेकिन इस फैसले के बाद लालू प्रसाद यादव के राजनीतिक कॅरियर पर ग्रहण लगना तो तय है। उल्लेखनीय है कि इस मामले में 3 वर्ष से 7 वर्ष तक की सजा हो सकती है और सजा मिलने के बाद लालू प्रसाद यादव अगले 6 वर्ष तक चुनाव नहीं लड़ सकेंगे।

 

लालू प्रसाद यादव का पूरा राजनीतिक कॅरियर दांव पर लगने के बाद अब उनकी पार्टी की डूबती नैया पर सभी अपनी नजरें गड़ाए बैठे हैं। पिछले काफी समय से लालू प्रसाद यादव ने राष्ट्रीय जनता दल की लगाम अपने हाथ में ले रखी है लेकिन अब जब उनके ही जेल जाने के दिन नजदीक आ गए हैं तो ऐसे में यह सवाल उठने लगा है कि लंबे समय तक यूपीए की साथी रही और वर्तमान में 4 सीटों के साथ यूपीए को बाहर से समर्थन देने वाली पार्टी राष्ट्रीय जनता दल को क्या अब कांग्रेस का समर्थन मिल पाएगा? इसके साथ ही यह भी एक बड़ा प्रश्न है कि अब लालू के राजनैतिक कॅरियर का क्या होगा?

 

बुद्धिजीवियों का एक वर्ग ऐसा है जो यह मान रहा है कि राजद और लालू प्रसाद यादव के दिन लद गए हैं और यूपीए की नजरें अब बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री और जदयू प्रमुख नीतीश कुमार पर हैं। नरेंद्र मोदी के मुद्दे पर एनडीए से अलग होने वाले नीतीश कुमार बिहार में अपना कद लगातार बढ़ाते जा रहे हैं। यहां तक कि बिहार की जनता को वह काफी पसंद भी आ रहे हैं और वैसे भी लालू प्रसाद यादव के राजनैतिक कॅरियर की नियति पर विश्वास भी नहीं किया जा सकता। कहते हैं ना उगते हुए सूरज को सभी सलाम करते हैं और इसी अवधारणा के तहत अब यूपीए की कोशिश नीतीश कुमार को अपने पाले में करने की रहेगी।

 

 

वहीं दूसरी ओर वे लोग हैं जिनका यह कहना है कि कांग्रेस कभी अपने वफादारों को अकेला नहीं छोड़ती। कांग्रेस की यह खासियत रही है कि वह अपने साथियों को कभी मुश्किल में अकेला नहीं छोड़ती इसीलिए लालू प्रसाद यादव की अनुपस्थिति में निश्चित रूप से कांग्रेस राजद को मझधार में नहीं छोड़ेगी। वर्ष 2009 तक राजद यूपीए का हिस्सा रही है और अब गठबंधन को बाहर से समर्थन दे रही है। अगर लालू प्रसाद पर कुछ कड़े प्रतिबंध लगते हैं तो निश्चित रूप से कांग्रेस राष्ट्रीय जनता दल का साथ नहीं छोड़ेगी और राजद की डूबती नैया को पार लगा देगी।

 

उपरोक्त मसले और हालिया समीकणों से जुड़े उपरोक्त पक्षों पर विचार करने के बाद निम्नलिखित प्रश्न हमारे सामने उपस्थित हैं, जैसे:

 

 

 

1. क्या लालू के बिना राजद को संभलने का मौका मिल पाएगा?

 

 

 

2. चारा घोटाले में सजा मिलने के बाद क्या वाकई बिहार की राजनीति से राजद का पत्ता साफ हो जाएगा?

 

 

 

3. नीतीश की बयार से प्रभावित यूपीए क्या राजद को संभालने में दिलचस्पी लेगी?

 

 

 

4. यूपीए गठबंधन का पुराना साथी होने का क्या राष्ट्रीय जनता दल को फायदा मिलेगा?

 

 

 

 

अपने पाठकों से इस बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दे पर विचार रखे जाने की अपेक्षा करता है। इस बार का मुद्दा है:

 

 

 

क्या बिहार की राजनीति से राजद का पत्ता साफ हो जाएगा?

 

 

 

 

 

आप उपरोक्त मुद्दे पर अपने विचार स्वतंत्र ब्लॉग या टिप्पणी लिख कर जाहिर कर सकते हैं।

 

 

 

 

S.P- Susaasan or Kusaasan

Posted by VIVEK KUMAR SINGH on September 26, 2013 at 4:55 AM Comments comments (0)

27 अगस्त, 2013 को मुजफ्फरनगर के रहने वाले शहनवाज कुरैशी और गौरव नाम के दो युवकों के बीच झगड़े की शुरुआत ने कुछ ही दिनों में दंगों का रूप ले लिया, जिसके परिणामस्वरूप कई बेगुनाहों ने इस झगड़े में अपनी जान गंवा दी।

 

अखिलेश यादव के उत्तर प्रदेश की सत्ता संभालने से लेकर अब तक प्रदेश में कई बार हिन्दू-मुस्लिम दंगे भड़क चुके हैं। उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में सांप्रदायिक दंगों के बाद गृह मंत्रालय ने एक रिपोर्ट जारी की। रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेश में 2012 में सांप्रदायिक हिंसा के 104 मामले दर्ज किए गए थे। जबकि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने माना था कि 2012 में उत्तर प्रदेश में 27 दंगे हुए। अखिलेश यादव ने दंगों का सारा दोष उन सांप्रदायिक ताकतों के सिर मढ़ा था जो उनकी सरकार को कमजोर करना चाहती हैं। विपक्षी दल भाजपा भी अखिलेश सरकार को सीधे-सीधे दंगों के लिए जिम्मेदार ठहरा रही है। यही कारण है अब यह मसला एक बहुत बड़ी बहस का मुद्दा बन गया है कि सपा सरकार क्यों ऐसे दंगों को रोकने में नाकामयाब सिद्ध हो रही है?

 

बुद्धिजीवियों के एक वर्ग का कहना है कि यूं तो पहले भी अखिलेश यादव के पिता और प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव पर मुस्लिम परस्ती के आरोप लगते रहे हैं और अब अपने छोटे से शासनकाल में हुए 27 दंगों को ‘सिर्फ 27 दंगे’ कहकर संबोधित करना इस बात का प्रमाण है कि अखिलेश भी अपने पिता की ही राह पर चल रहे हैं। इस वर्ग में शामिल लोगों ने सपा पर यह भी आरोप लगाया है कि यह सरकार हिन्दू-मुस्लिम दंगों को रोकने की बजाय उन्हें भड़कने देती है जिससे कि एक समुदाय को ताकतवर होने का पूरा-पूरा मौका मिलता है। प्रदेश में शांति व्यवस्था स्थापित करने में पूरी तरह विफल हो चुकी सपा सरकार उसी रणनीति पर चल रही है जिस पर मुलायम सिंह काम किया करते थे। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि मुस्लिम वोट ही सपा का सबसे बड़ा वोट-बैंक है और अपने वोट-बैंक को बरकरार रखने के लिए वह कोई भी हथकंडा अपना सकती है फिर चाहे कितने ही मासूमों को अपनी जान से हाथ क्यों ना गंवानी पड़े।

 

वहीं दूसरी ओर जो पहले पक्ष से बिल्कुल सहमति नहीं रखते, उनका कहना है कि सर्वप्रथम तो ऐसे दंगों को किसी सरकार विशेष के साथ जोड़कर देखना सरासर गलत है। जहां तक अखिलेश यादव का सवाल है तो वह अपनी जिम्मेदारियां जानते हैं और उन्हें पता है कि प्रदेश में शांति व्यवस्था स्थापित रखना उनका कर्तव्य है जिसे वह निभा भी रहे हैं। निजी झगड़ा कब दंगे का रूप ले लेगा इस बात का अंदाजा अखिलेश क्या कोई भी सरकार नहीं लगा सकती। दंगा कोई भी हो उसमें नुकसान दोनों पक्षों का होता है इसीलिए किसी भी रूप में अखिलेश सरकार या सपा पर मुस्लिम परस्ती का आरोप नहीं लगाया जा सकता।

 

उपरोक्त मसले के दोनों पक्षों पर विचार करने के बाद निम्नलिखित प्रश्न हमारे सामने उपस्थित हैं जिनका जवाब ढूंढ़ना नितांत आवश्यक है,जैसे:

 

1. क्या वाकई उत्तर प्रदेश की सपा सरकार राज्य में भड़कने वाले सांप्रदायिक दंगों को शांत करने की बजाय उन्हें बढ़ावा देती है?

2. यह बात जगजाहिर है कि मुलायम सिंह यादव मुस्लिम परस्त राजनेता रहे हैं, तो क्या उनके पुत्र और यूपी के वर्तमान मुख्यमंत्री अखिलेश भी कुछ ऐसा ही कर रहे हैं?

3. कहीं ऐसा तो नहीं कि सपा सरकार को बदनाम करने के लिए यह विपक्ष की सोची-समझी चाल हो?

4. किसी को इस बात का अंदाजा नहीं होता कि कब कौन सा झगड़ा दंगे का रूप ले लेगा, ऐसे में सपा सरकार पर निशाना साधना कहां तक सही है?

 

जागरण जंक्शन इस बार के फोरम में अपने पाठकों से इस बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दे पर विचार रखे जाने की अपेक्षा करता है। इस बार का मुद्दा है:

 

क्या सपा के “सुशासन” पर सवालिया निशान बन रहे हैं दंगे?

 

 

आप उपरोक्त मुद्दे पर अपने विचार स्वतंत्र ब्लॉग या टिप्पणी लिख कर जाहिर कर सकते हैं।

 

Social Media- Is it really Curse?

Posted by VIVEK KUMAR SINGH on September 26, 2013 at 4:50 AM Comments comments (0)

मुजफ्फरनगर दंगों के बाद बुलाई गई राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपनी चिंता जाहिर करते हुए सोशल मीडिया को आड़े हाथों लिया। उनका कहना था कि सोशल मीडिया का जिस तरह प्रयोग होना चाहिए वैसे नहीं हो पा रहा है। प्रधानमंत्री का कहना था कि युवाओं के लिए सोशल नेटवर्किंग साइटें जानकारियां प्राप्त करने और उन्हें साझा करने का अच्छा माध्यम साबित हो सकती हैं लेकिन इसका प्रयोग इस दिशा में नहीं हो पा रहा है। मुजफ्फरनगर दंगों के बाद उठी यह चर्चा कोई आज की बात नहीं है हर बार यही देखा जाता है कि जब भी कोई घटना घटित होती है तो उससे संबंधित चर्चाएं फेसबुक और ट्विटर जैसी सोशल नेटवर्किंग साइटों पर आम होने लगती हैं। दिल्ली गैंग रेप केस हो या फिर मुजफ्फरनगर में हुए दंगे, हर बार यही देखा जाता है कि कई बार सोशल नेटवर्किंग साइटों पर डाली गई जानकारियां व्यवस्थित माहौल को बिगाड़ने लगती हैं और समाज में एक अजीब से तनाव को जन्म दे देती हैं। महिलाओं की सुरक्षा और सांप्रदायिक सद्भाव दो ऐसे मुद्दे हैं जिस पर सोशल नेटवर्किंग साइटों पर होने वाली पोस्ट सबसे ज्यादा प्रभाव डालती हैं। हमारा समाज बहुत संवेदनशील है और कोई भी नकारात्मक या भ्रामक जानकारी समाज के लिए खतरा पैदा कर सकती है। ऐसे हालातों के मद्देनजर सोशल नेटविंग साइटों पर नियंत्रण और महिलाओं की सुरक्षा से जुड़ी उनकी भूमिका को लेकर एक बहस शुरू हो गई है।

 

बहुत से ऐसे लोग हैं जिनका मानना है कि फेसबुक, ट्विटर जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर नियंत्रण की बात लोकतांत्रिक समाज को शोभा नहीं देती। लोकतंत्र में सभी को अपनी बात कहने का अधिकार है और इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए सोशल नेटवर्क सबसे ज्यादा उपयोगी साबित होता है। जहां तक महिलाओं का मसला है तो ऐसी साइटों के माध्यम से वह अपने अधिकारों से संबंधित जानकारियां हासिल कर सकती हैं, अपनी बात अन्य लोगों को बता सकती हैं। वहीं दूसरी ओर इन सभी साइटों की ही वजह से आमजन अपने आसपास घट रही घटनाओं से परिचित होकर उन पर अपनी टिप्पणी कर सकते हैं, उनसे जुड़े पक्षों से अवगत हो सकते है। साथ ही सरकारी क्रियाकलापों और योजनाओं की जानकारी भी प्राप्त कर सकते हैं। इस वर्ग में शामिल लोग यह भी स्वीकार करते हैं कि हालांकि कुछ शरारती तत्व ऐसे हैं जो शांति व्यवस्था को आहत करने के लिए इन सोशल नेटवर्किंग साइटों का प्रयोग करते हैं लेकिन कुछ चुनिंदा लोगों की वजह से सोशल नेटवर्किंग को नियंत्रित करना सही नहीं है क्योंकि ये वो लोग हैं जो कोई ना कोई माध्यम ढूंढ़कर अपना मकसद पूरा कर ही लेंगे।

 

वहीं दूसरी ओर वे लोग हैं जिनका पक्ष है सोशल मीडिया को पूरी तरह नियंत्रित करना। इस वर्ग के लोगों का यह साफ कहना है कि बिना नियंत्रण के कभी कोई चीज लाभप्रद नहीं हो सकती। सोशल मीडिया पर प्रसारित सामग्रियों पर कोई निगरानी ना होने के कारण राष्ट्रीय अखंडता पर हर समय खतरा मंडराता रहता है। कभी भी कोई भी व्यक्ति कुछ भी ऐसा संचालित कर सकता है जो सामुदायिक या जातिगत भावनाओं को भड़का सकता है जिसकी वजह से सामाजिक ढांचा लड़खड़ा सकता है। सोशल मीडिया पर नियंत्रण रखने की मांग करने वालों का यह भी कहना है कि निजता का हनन, धार्मिक और सामाजिक भावनाओं को भड़काना, महिलाओं के विषय में भद्दी टिप्पणियां करना अनियंत्रित सोशल मीडिया का बड़ा दुष्प्रभाव है, जिसे दूर सिर्फ सोशल मीडिया को नियंत्रित कर के ही किया जा सकता है।

 

उपरोक्त चर्चा के दोनों पक्षों को जानने और समझने के बाद निम्नलिखित प्रश्न हमारे सामने उपस्थित हैं जिनका जवाब ढूंढ़ना हमारे लिए नितांत आवश्यक है, जैसे:

1. अनियंत्रित सोशल मीडिया शांति व्यवस्था के लिए किस प्रकार खतरा हो सकती है?

2. क्या सोशल मीडिया का उपयोग महिलाओं की सुरक्षा और उनकी अस्मिता के लिए खतरा है?

3. क्या नियंत्रित सोशल मीडिया लोकतंत्र के मूलभूत सिद्धांत के खिलाफ है?

4. क्या अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर किसी की निजता का हनन सही है?

 

Vivek Singh इस बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दे पर विचार रखे जाने की अपेक्षा करता है। इस बार का मुद्दा है:

 

देशहित के खिलाफ है आजाद सोशल मीडिया ?

 

आप उपरोक्त मुद्दे पर अपने विचार स्वतंत्र ब्लॉग या टिप्पणी लिख कर जाहिर कर सकते हैं।


 

Real story of American Dollar v/s Indian Rupee

Posted by VIVEK KUMAR SINGH on August 20, 2013 at 4:10 AM Comments comments (0)

Real story of American Dollar v/s Indian Rupee

(Very Interesting Article MUST SHARE)

An Advice to all who are worrying about fall of Indian Rupee

 

Throughout the country please stop using cars except for emergency for only seven days (Just 7 days)

Definitely Dollar rate will come down. This is true. The value to dollar is given by petrol only.This is called Derivative Trading. America has stopped valuing its Dollar with Gold 70 years ago.

 

Americans understood that Petrol is equally valuable as Gold so they made Agreement with all the Middle East countries to sell petrol in Dollars only. That is why Americans print their Dollar as legal tender for debts. This mean if you don't like their American Dollar and go to their Governor and ask for repayment in form of Gold,as in India they won't give you Gold.

 

You observe Indian Rupee, " I promise to pay the bearer..." is clearly printed along with the signature of Reserve Bank Governor. This mean, if you don't like Indian Rupee and ask for repayment,Reserve Bank of India will pay you back an equal value of gold.(Actually there may be minor differences in the Transaction dealing rules, but for easy comprehension I am explaining this)

 

Let us see an example. Indian petroleum minister goes to Middle East country to purchase petrol, the Middle East petrol bunk people will say that liter petrol is one Dollar.

But Indians won't have dollars. They have Indian Rupees. So what to do now? So That Indian Minister will ask America to give Dollars. American Federal Reserve will take a white paper , print Dollars on it and give it to the Indian Minister. Like this we get dollars , pay it to petrol bunks and buy petrol.

 

But there is a fraud here. If you change your mind and want to give back the Dollars to America we can't demand them to pay Gold in return for the Dollars. They will say " Have we promised to return something back to you? Haven't you checked the Dollar ? We clearly printed on the Dollar that it is Debt"

So, Americans don't need any Gold with them to print Dollars. They will print Dollars on white papers as they like.

 

But what will Americans give to the Middle East countries for selling petrol in Dollars only?

 

Middle East kings pay rent to America for protecting their kings and heirs. Similarly they are still paying back the Debt to America for constructing Roads and Buildings in their countries. This is the value of American Dollar. That is why Many say some day the Dollar will be destroyed.

 

At present the problem of India is the result of buying those American Dollars. American white papers are equal to Indian Gold. So if we reduce the consumption of petrol and cars, Dollar will come down

 

The Above Details are translated originally from Telugu Language to English by Radhika Gr.

Kindly share this and make everyone aware of the facts of American Dollar V/s Indian Rupee.

 

And here is a small thing other than petrol , what we can do to our Indian Rupee

 

YOU CAN MAKE A HUGE DIFFERENCE TO THE INDIAN ECONOMY BY FOLLOWING FEW SIMPLE STEPS:-

 

Please spare a couple of minutes here for the sake of India.

Here's a small example:-

 

At 2008 August month 1 US $ = INR Rs 39.40

At 2013 August now 1 $ = INR Rs 62

 

Do you think US Economy is booming? No, but Indian Economy is Going Down.

 

Our economy is in your hands.INDIAN economy is in a crisis. Our country like many other ASIAN countries, is undergoing a severe economic crunch. Many INDIAN industries are closing down. The INDIAN economy is in a crisis and if we do not take proper steps to control those, we will be in a critical situation. More than 30,000 crore rupees of foreign exchange are being siphoned out of our country on products such as cosmetics, snacks, tea, beverages, etc. which are grown, produced and consumed here.

 

A cold drink that costs only 70 / 80 paise to produce, is sold for Rs.9 and a major chunk of profits from these are sent abroad. This is a serious drain on INDIAN economy. We have nothing against Multinational companies, but to protect our own interest we request everybody to use INDIAN products only at least for the next two years. With the rise in petrol prices, if we do not do this, the Rupee will devalue further and we will end up paying much more for the same products in the near future.

 

What you can do about it?

Buy only products manufactured by WHOLLY INDIAN COMPANIES.Each individual should become a leader for this awareness. This is the only way to save our country from severe economic crisis. You don't need to give-up your lifestyle. You just need to choose an alternate product.

 

Daily products which are COLD DRINKS,BATHING SOAP ,TOOTH PASTE,TOOTH BRUSH ,SHAVING CREAM,BLADE, TALCUM POWDER ,MILK POWDER ,SHAMPOO , Food Items etc. all you need to do is buy Indian Goods and Make sure Indian rupee is not crossing outside India.

 

Every INDIAN product you buy makes a big difference. It saves INDIA. Let us take a firm decision today.

 

we are not anti-multinational. we are trying to save our nation. every day is a struggle for a real freedom. we achieved our independence after losing many lives.

they died painfully to ensure that we live peacefully. the current trend is very threatening.

 

multinationals call it globalization of indian economy. for indians like you and me, it is re-colonization of india. the colonist's left india then. but this time, they will make sure they don't make any mistakes.

 

russia, s.korea, mexico - the list is very long!! let us learn from their experience and from our history. let us do the duty of every true indian. finally, it's obvious that you can't give up all of the items mentioned above. so give up at least one item for the sake of our country!

 

We would be sending useless forwards to our friends daily. Instead, please forward this to all your friends to create awareness.

?? ??????? + ?? ???? = ??? ????

Posted by VIVEK KUMAR SINGH on August 10, 2013 at 9:05 AM Comments comments (0)

राजनीति की चटर पटर और बात का बतंगड़ : क्या यह संभव है कि कोई मंत्री, किसी विभाग का मुखिया सीएमओ को महत्व ना दे! ऐसा नामुमकिन नहीं तो मुश्किल बहुत है। आरपीएस की तबादला लिस्ट के बाद इस प्रकार की चटर-पटर कई जगह सामने आई। कुछ समय पहले मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और गृह मंत्री शांति धारीवाल के बीच दूरी या वैचारिक, राजनीतिक मतभेद थे। तब सीएमओ की लिस्ट ही विभाग की तबादला सूची होती थी। जनप्रतिनिधि सीएमओ में डिजायर भेजते। इन दिनों दोनों में सम्बन्ध सामान्य है। इसलिए सीएम आम तौर पर डिजायर सीधे गृहमंत्री को देने का संकेत करते थे। फिर भी मुख्यमंत्री को गृह विभाग से सम्बंधित डिजायर मिलती ही रही। सीएमओ ने किसकी सिफारिश की किसकी नहीं की। यह तो वही जाने। मगर बहुत सी डिजायर का परिणाम नहीं निकला। इस वजह से चर्चा ये होने लगी कि गृह मंत्री सीएमओ की सिफारिश की अधिक परवाह नहीं करते।

 

अब डीजीपी और गृहमंत्री में खटपट की खुसर-फुसर है। दोनों एक दूसरे की बात पर कभी कभी कान नहीं धरते। फ़िलहाल जिसकी डिजायर के माफिक नियुक्ति नहीं हुई उनको सीएम के पास जाने को कहा जाता है। वहां तक जाने की हिम्मत कम ही करेंगे। यही तो वे चाहते हैं। तभी तो बड़े अफसर कई स्थानों पर अपने प्यादे फिट करने में सफल हो जाते हैं। हालाँकि इस प्रकार की खटपट को कोई साबित नहीं कर सकता। लेकिन कार्यप्रणाली से कहाँ, क्या और क्यूँ हो रहा है इसका अंदाजा जरुर लग जाता है।

 

ये तो पहले सोचते : बीएसपी छोड़ कांग्रेस का पल्लू पकड़कर मंत्री बने विधायक बेबस हैं। ऐसे ही एक मंत्री ने बैठक में सीएम से कहा कि उसके इलाके में छह क़त्ल हो गए। बार-बार कहने के बावजूद सीआई नहीं बदला गया। दूसरे मंत्री ने कहा कि दौरे के समय कांग्रेस के दफ्तर खुले नहीं मिलते। असली कांग्रेस का मंत्री बोला, तो अपने दफ्तर में चले जाया करो। इस ताने पर दलबदलू मंत्री को ताव आ गया। आइन्दा हम अपने दफ्तर में ही रुका करेंगे, वह बोला। बैठक के बाद उनको कई शुभचिंतकों ने बताया कि अपना घर छोड़ने का क्या नुकसान होता है। मंत्री तो हैं परन्तु चलने चलाने को तो राम जी का नाम ही है।

 

बात का बतंगड़ : कृषि विपणन मंत्री गुरमीत सिंह कुनर के लिफ्ट में फंसने की खबर ने खासकर इस इलाके में खूब पाठक बटोरे। असल में तो कोई बात ही नहीं थी। श्री कुनर अपने एक अधिकारी के साथ लिफ्ट में दाखिल हुए। लिफ्ट मैन तो था ही। एक मंडी समिति का अध्यक्ष आ गया जो बीजेपी का था। लिफ्ट का बटन दबाया वह चली नहीं। लिफ्ट मैन ने यह कहकर कि वजन अधिक है अध्यक्ष को लिफ्ट से बाहर कर दिया। लिफ्ट फिर भी ऊपर नहीं उठी। लिफ्टमैन खुद भी निकल आया। श्री कुनर ने एक, दो मिनट बटन दबाया, लिफ्टमें कोई हरकत नहीं हुई। श्री कुनर बाहर आ गए। हाँ लिफ्ट में फंसने की खबर छपने के बाद श्री कुनर के पास शुभचिंतकों के फोन बहुत आए। इसके अलावा जो भी उनको मिलता यही सवाल करता, लिफ्ट में कैसे फंस गए? किसी को बता देते किसी के सामने बस मुस्करा कर रह जाते।

 

अब एक एसएमएस : भेजने वाले का नाम नहीं पता। सन्देश है : एक करोड़ को कहते हैं एक खोखा। पांच सौ करोड़ को एक कोड़ा। अब एक हजार करोड़ का मतलब है एक राडिया। दस हजार करोड़ अर्थात एक कलमाड़ी। एक लाख करोड़ को एक राजा। दस कलमाड़ी प्लस एक राजा बराबर एक शरद पवार।

 

 

Ali in Diwali and Ram in Ramzan

Posted by VIVEK KUMAR SINGH on August 8, 2013 at 10:25 AM Comments comments (0)

Social networking site Facebook is being flooded with millions of messages, urging people to unite and spread the message of brotherhood, in view of the Ayodhya verdict on September 24.

 

A wave of peace and unity has taken over everyone, binding all people in one voice, irrespective of their faith. Unlike what happened years ago, this time people are unanimously calling for unity.

 

Sagar Bagga, a youngster, wrote, “Who r we, Hindu or Muslim?? Wen dere is ‘ALI’ in Diwali & ‘RAM’ in Ramzan. Help India in being united!!! Spread dis msg as far as u can for September 24. Sabse pehle ‘We r Indians’...Luv all hate none.”

 

“None of us is stronger dan all of us...copy paste on ur status.”

 

Similarly, many other youngsters have also changed their status message to promote harmony and requested others to follow suit.

 

Another youth Abhinav Dutt posted, “We are Indians first and trust me, it doesn’t really matter what the verdict is. Life will go on as it is. Yes, no doubt some politicians will get a chance to show how mean they can get. I have set my status message, which says we are Indians first so let’s not get affected by whatever the verdict in this case comes out to be.”

 

A young professional, Alina, wrote on her wall, “Kis kaam ke mandir masjid, kis kaam ke hain gurudware, is desh ke beghar bachche, jab firte maare maare” (“What is the point in having temples, mosques, and gurudwaras when the homeless children wander aimlessly and without help?”;). Why don’t they just build an orphanage or hospital at disputed the site in Ayodhya. The result will help nobody but politicians.

 

Friends pls promote this thought by making ds ur status atleast till September 24 so that the supreme court cn also gt d opinion of all the Indians, before making the decision. Hope, it will have a little effect.!!”

 

With millions of users changing their status messages, this initiative of brotherhood is spreading like wild fire. It makes it evident that India wants peace and harmony.

 

Pradeep Agarwal, a government employee, wrote, “Jis desh me Diwali me Ali ka aur Ramzan me Ram ka vaas ho, waha kuch galat kaise ho sakta hai?” (How can anything go wrong in a country where Ali is a part of Diwali and Ram of Ramzan)?

GangaDhar He shaktimaan hai

Posted by VIVEK KUMAR SINGH on August 1, 2013 at 1:40 PM Comments comments (0)

कुछ लोगों का मानना है की आईएएस अधिकारी दुर्गा शक्ति का निलंबन अखिलेश के आदेश से हुआ,

कुछ लोगों का मानना है की आईएएस अधिकारी दुर्गा शक्ति का निलंबन मुलायम के आदेश से हुआ,

 

अब इन्हें कौन समझाए की 'गंगाधर' ही 'शक्तिमान' है.


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