VIVEK KUMAR SINGH

TSO @ Hindustan Unilever Ltd. Lucknow U.P.

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No Humanity in Gov.???????? ?? ???? ?? ????? ?????? ??????

Posted by VIVEK KUMAR SINGH on January 10, 2014 at 1:55 AM Comments comments (0)

प्रभु तेरे देश मे भाटी भाटी के लोग कुछ तो............क्या कहना अब समझ नही आता.

 

एक तरफ जहां दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल व्यवस्था को चाक-चौबंद बनाने के लिए नित नए-नए घोषणाएं और कार्यवाही कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ दिल्ली के पड़ोस उत्तर प्रदेश में सारे नियम-कानून तथा मानवीय मूल्यों को ताक पर रखकर अखिलेश यादव और उनके बड़े मंत्री मौजमस्ती और विदेशी दौरे करने में व्यस्त हैं.

 

बात ए है के दोषी कोन? सरकार? नही . अखिलेश यादव? नही तो कोन? मई बताता हु गलते हमारे है, जनता की.

 

 

कड़ाके की ठंड में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा करोड़ो रुपए खर्च करके सैफई महोत्सव मनाए जाने को लेकर विपक्ष की तीखी आलोचनाओं के बीच मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का पैतृक गांव बुधवार को शाम फिल्मी सितारों की चकाचौंध से सराबोर रहा, वहीं पांच घंटे की दूरी पर स्थित मुजफ्फरनगर में दंगा पीड़ित ठंड और बीमारियों से मर रहे हैं. यही नहीं अखिलेश सरकार के कई मंत्री अपनी जिम्मेदारियों को भूलकर विदेशी दौरे पर हैं. हालांकि राज्य सरकार इस दौरे को स्टडी ट्रिप बता रही है.

 

 

वास्तविकता से बेखबर अखिलेश सरकार पर अब सवाल उठाए जा रहे हैं कि लगातार हो रहे दंगों, सपा विधायकों की गुंडागर्दी के बीच मुलायम और अखिलेश को मौजमस्ती से हटकर थोड़ा भी वक्त नहीं है कि वह दंगा पीड़ितों से जाकर मिलें और प्रशासन की सुध लेने की जहमत उठा सकें.

 

 

आज का मुद्दा (आप लोगो के राए महत्वपूर्ण है)

 

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आभारी

 

विवेक कुमार सिंह

 

Kitne Din Ke dhaar?AAP ke sarkaar

Posted by VIVEK KUMAR SINGH on December 31, 2013 at 2:55 AM Comments comments (0)

शनिवार 28 दिसंबर को कांग्रेस के समर्थन से दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बन चुकी है और ‘आप’ के संयोजक अरविंद केजरीवाल दिल्ली के सातवें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले चुके हैं। इन सब के बीच केजरीवाल और उनकी पार्टी ने यह साफ कर दिया है कि कांग्रेस के शासन में जितने भी घोटाले और भ्रष्टाचार हुए हैं, उन सब की फाइलें दोबारा से खोली जाएंगी।

 

ऐसे में यह सवाल उठने लगा है कि कांग्रेस के आठ विधायकों के समर्थन से दिल्ली में जो सरकार बनने जा रही है, क्या वह पांच साल का कार्यकाल पूरा कर पाएगी। विशेषज्ञों का एक समूह यह मानता है कि भाजपा में मोदी की लहर को देखते हुए कांग्रेस कम से कम आम चुनाव तक दिल्ली की सरकार भंग करने के बारे में विचार नहीं करेगी, क्योंकि कांग्रेस को लगता है कि मोदी को शहरों में अगर कोई रोक पाएगा तो वह हैं अरविंद केजरीवाल।

 

वहीं दूसरी तरफ विशेषज्ञों का एक समूह मानता है कि कांग्रेस ‘आप’ को समर्थन देने की घोषणा करके असमंजस में आ गई है। जिस जोश के साथ उसने ‘आप’ को समर्थन देने की बात की थी, वह जोश लगातार ‘आप’ के नेताओं की तरफ से कांग्रेस के खिलाफ की जा रही बयानबाजी के चलते ठंडा पड़ता दिख रहा है। इसलिए सरकार एक महीना भी चल जाए तो बहुत है।

 

Software developed to automatically write articles on Narendra Modi

Posted by VIVEK KUMAR SINGH on December 28, 2013 at 6:15 AM Comments comments (0)

Allahabad. A 19-year-old student from IIIT (Indian Institute of Information Technology) here has claimed to develop a software that can come up with news and opinion articles on Narendra Modi with a mouse click.

“I have been an internet troll and have trolled on every topic,” Ranjit Prasad, the third-year student proudly told Faking News how he got the idea to develop the software, “After 3 years of full-time trolling and part-time studies, I finally concluded that anything related to Narendra Modi trends on the internet instantly.”

Narendra Modi

There is no upper cap on the number of articles a website can publish on Modi

“People feel duty bound to express opinion on Modi and media organizations work against killing deadlines to come up with reports on Modi. I could see a huge demand for Narendra Modi based articles,” the developer of NaMoPad application claimed.

NaMoPad – the software can meet this demand, Ranjit claims. All one needs to do is to feed in some keywords and indicate world count, and a grammatically correct article on Narendra Modi will be ready for publication within seconds.

“Premium version of the software will be able to come up with opinion articles containing in high-sounding philosophical and economical terms. I’m currently working on them,” the soon-to-be-rich teenager revealed.

All leading journalists and media houses (including Faking News) have expressed desire in buying this software as no one wants to lose on the potential traffic a Narendra Modi article can attract. The only journalistic concern is about the articles being “exclusive” and unique.

“Of course, unique articles can be generated using the software. Yes, primarily it will use the same old arguments and content, but with clever permutations and combinations, a seemingly new article can be generated,” Ranjit explained the working of his software.

“That’s precisely what anyway happens when an article on Narendra Modi is written in the real world by real people,” he added.

Ranjit is further planning to develop an Android and iOS application that will automatically tweet or update Facebook status messages about Narendra Modi.

“Windows already has MODI (Microsoft Office Document Imaging),” he pointed out.


Source - firstpost

Tarun ko faasi kyun na de?

Posted by VIVEK KUMAR SINGH on December 20, 2013 at 8:05 AM Comments comments (0)

वाह वाह

 

वाह वाह

 

क्या बात है तरुण तेजपाल महोदय.आप तो हमारे सत्ताधीशों के भी पितामह निकले .खुद ही संगीन जुर्म में लिप्त होना ,फिर डंके की चोट पर उसको स्वीकारना और नीर-क्षीर विवेकी निर्णायक बनकर भी खुद अपने मन की अदालत में तय करके फैसला सुना देना और वो भी दंड नहीं अपितु पुरस्कार ” मैं 6 महीने काम नहीं करूंगा पत्रकारिता से दूर रहूँगा”

 

सारी दुनिया में अपने झूठे -सच्चे,प्रायोजित स्टिंग आपरेशंस से तहलका मचा कर आप ये भूल ही गये कि आपका अपना चरित्र कितना घिनौना है.

 

क्या विचित्र हास्यास्पद वृत्तांत ——– अब आप 6 माह पूर्णतया आराम के मूड में है .आप जानते हैं खाली दिमाग क्या होता है शैतान का घर .आप तो काम में व्यस्त रहते हुए भी इतने बड़े मक्कार,शैतान,झूठे,बलात्कारी हैं और जब दिमाग खाली होगा तो क्या गुल खिलाएगा आपका दिमाग , सहज ही कल्पना की जा सकती है. किसी माँ,बहिन,पुत्री समान लडकी या महिला को बर्बाद करने के लिए अभी तो संभवतः पत्रकारिता जैसे कार्य में कुछ समय देने के कारण कम समय मिलता है ,फिर तो आप आज़ाद हैं पूर्णतया, देश-विदेश में कहीं भी स्वछन्द हो कर अपने दुष्कृत्यों को पूर्ण करने के लिए - और बेरोकटोक अनैतिक कृत्यों के लिए .

 

जिन कुख्यात कहूं या विख्यात तरुण तेजपाल के संदर्भ में बात हो रही है चलिए उनका इतिहास जान लेते है जरा………………..

मशहूर पत्रकार और तहलका के एडिटर इन चीफ तरुण तेजपाल पर साथी पत्रकार के यौन उत्पीड़न का सनसनीखेज आरोप लगा है.ये महोदय कोई छोटी हस्ती नहीं अपितु ,महान हस्ती हैं जो ऐसे क्षेत्र से लगभग 28 वर्ष से जुड़े हैं,जो बखिया उधेड़ने में माहिर होते हैं.लेकिन बखिया उधेड़ने का काम एक निर्भीक और निष्पक्ष पत्रकार के रूप में नहीं शायद बिकाऊ बनकर करते हैं.

 

तरुण तेजपाल एक जग विख्यात नाम बन चुका है, जिन्होंने इण्डिया टुडे से अपने पत्रकारिता में अपने करियर का श्रीगणेश किया,तदोपरांत इन्डियन एक्सप्रेस ,और आऊटलुक से जुड़े रहे ,उपन्यास लेखक भी बने और पत्रकारिता में लगभग तीन दशक से सक्रिय हैं. .

 

आपरेशन वेस्ट एंड से जार्ज फर्नांडीज ,को त्यागपत्र देने को विवश करने वाले,समता पार्टी की जया जेटली आदि पर अंगुलियाँ उठाकर उनका राजनैतिक करियर समाप्त करवाने वाले,क्रिकेट में फिक्सिंग के नाम पर मनोज प्रभाकर आदि खिलाड़ियों पर आजीवन प्रतिबन्ध लगवाने के लिए उत्तरदायी ,बंगारू लक्ष्मण को चंदे के मामले में जेल भिजवाने वाले , दयानिधि मारन का भ्रष्टाचार सामन लाने वाले ,गुजरात दंगों में हिन्दू संगठनों को स्टिंग आपरेशन के माध्यम से आरोपी सिद्ध करवाने वाले आदि आदि ………(यद्यपि बाद में वो सब झूठ निकला) तरुण तेजपाल अपने दुष्कृत्य के लिए दंडस्वरूप बस आनन्द अवकाश (प्लैजर लीव )लेना चाहते हैं.

 

भ्रष्टाचार ,साम्प्रदायिकता ,रिश्वतखोरी ,क्रिकेट फिक्सिंग बहुत बड़े अपराध हैं ,निश्चित रूप से यदि आरोप राजनीति से प्रेरित नहीं और सही है तो जो दंड मिले हैं, आवश्यक हैं ,परन्तु किसी नारी का अपमान वो भी बलात्कार जैसा मसला ! और उसके लिए दंड बस कार्य से विरत रहना! क्या तरुण तेजपाल की दृष्टि में बलात्कार कोई अपराध है ही नहीं .जिस अपराध पर देश भर में अपराधी को प्राणदंड की मांग की जाती है ,और तरुण तेजपाल पर पूर्व में भी आरोपी रहे हैं बलात्कार के लिए. दंड के नाम पर मजाक ! तरुण तेजपाल इस देश के क़ानून से ऊपर हैं या ऐसी क्या अहमियत रखते हैं कि मीडिया, सरकार ,प्रमुख संगठन मुख सिल कर बैठे हैं और .यहाँ तो अपराध भी स्वतः प्रमाणित है तो फिर प्राणदंड की मांग क्यों नहीं ?

 

आश्चर्य तो है मुझको तहलका की प्रबंध संपादिका सोमा चौधरी के बयान पर जो कहती हैं कि ये आंतरिक मामला है और उन्होंने माफी मांग ली है अतः उनको अगले छह माह के लिए सम्पादक के पद से अलग रखा जाएगा. यदि उनके स्वयम के साथ या उनके किसी परिजन के साथ ऐसा हो तो क्या उनके लिए ये विषय इतना ही हल्का रहेगा ? बलात्कार के बाद माफी मांग लेना पर्याप्त है उनकी दृष्टि में ?

 

केवल सोमा चौधरी ही नहीं कुछ अन्य महिला नेत्री नफीसा अली सदृश , क्या तरुण तेजपाल से भयभीत हैं जो उनके मुख से अब भी उनके विरोध में नहीं समर्थन में ही शब्द निकल रहे हैं. शब्द नहीं निकल रहे हैं. राजनीति में स्वार्थ इतना हावी है कि एक अपराधी के द्वारा स्वयम बलात्कार का अपराधी होना स्वीकार करने पर भी उसके विरुद्ध किसी दंड की मांग नहीं की जा रही है ?

 

 

Discussion 370

Posted by VIVEK KUMAR SINGH on December 6, 2013 at 2:30 AM Comments comments (0)

जब कभी भी भारतीय संविधान की धारा 370 को छेड़ा जाता है सियासी हलको में हलचल मचने लगती है। नरेंद्र मोदी ने पिछले रविवार को जम्मू में हुई अपनी रैली में इस धारा का जिक्र क्या किया हर तरफ से आवाजें उठने लगीं। विदित हो कि भारतीय संविधान की धारा 370 एक ‘अस्‍थायी प्रबंध’ के जरिए जम्मू और कश्मीर को एक विशेष स्वायत्तता वाले राज्य का दर्जा देता है। मोदी ने इस धारा पर नए सिरे से बहस कराए जाने की मांग की थी। उन्होंने इस धारा को छेड़ते हुए जम्मू कश्मीर में महिलाओं के साथ भेदभाव का आरोप लगाते हुए समान अधिकारों की बात कही। मोदी ने कहा कि जम्मू कश्मीर की महिलाओं को अन्य राज्यों की तरह जम्मू कश्मीर में समान अधिकार प्राप्त नहीं हैं।

 

इस मुद्दे पर जहां भाजपा और उसके सहयोगी दल एकमत दिखाई दे रहे हैं वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस सहित अन्य दूसरी पार्टियां इसे भाजपा की तरफ से फेंका गया चुनावी चारा बता रही हैं। उधर जम्मू कश्मीर की सभी क्षेत्रीय पार्टियां मोदी की इस मांग का कड़ा विरोध कर रही हैं। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने बुधवार को चेतावनी दी कि धारा 370 को रद्द करने के किसी भी कदम से राज्य के भारत में विलय का मुद्दा फिर खुल जाएगा। उमर ने साथ ही यह भी कहा कि संविधान की धारा 370 जम्मू कश्मीर और शेष भारत के बीच एक ‘पुल’ की तरह काम करती है और इसे कमजोर करने की कोशिश से सिर्फ यह संबंध ही कमजोर होगा।

आज का मुद्दा

क्या धारा 370 पर बहस देशहित में है ?

 

Everything is valid for vote

Posted by VIVEK KUMAR SINGH on November 4, 2013 at 8:20 AM Comments comments (1)

वोट के लिए कुछ भी करेगा

 

यह वोट ऐसी चीज है जिसे पाने के लिए पार्टियां कुछ भी कर सकती है. वह वोटरों को लालच दिखाती है, एक दूसरे के खिलाफ वैमनस्य पैदा करती है. अगर यह भी संभव न हो तो वह लोगों की जान लेने से भी नहीं हिचकिचाती.

 

 

 

patna blastभारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की रविवार को पटना के गांधी मैदान में ‘हुंकार रैली’ के पूर्व श्रृंखलाबद्ध हुए बम विस्फोट इसी का ही नतीजा माना जा रहा है. इस हमले पांच लोगों की मौत हो गई है जबकि 83 लोग घायल हो गए. इस बीच राजनीति पार्टियों ने श्रृंखलाबद्ध हमलों का राजनीतिकरण करने में तनिक भी देरी नहीं लगाई. आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है. फिलहाल बम विस्फोटों की जांच के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (एनएसजी) और राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की टीमें पटना रवाना की गई हैं.

 

 

इस कहा जा रहा है कि बिहार की राजधानी पटना में हुए सीरियल बम धमाकों के तार झारखंड की राजधानी रांची से हैं. रविवार की देर रात रांची से झारखंड पुलिस ने दो संदिग्धों को हिरासत में लिया है. इन दोनों संदिग्धों को रांची के धुर्वा इलाके की सिठियो बस्ती से पकड़ा गया.

 

 

पटना के गांधी मैदान में ‘हुंकार रैली’ के पूर्व श्रृंखलाबद्ध हुए बम विस्फोट ने कई अहम सवाल छोड़े हैं.

 

 

 

कई अहम सवाल

 

1. बताया जा रहा है कि इस रैली का आयोजन भाजपा की तरफ से पिछले कई महीनों से किया जा रहा है. इसके लिए राज्य भाजपा के नेताओं ने बिहार सरकार से अनुमति भी ले ली थी. इसके बावजूद भी मोदी की विशाल रैली में प्रसाशनिक चुक कैसे हो गई.

 

 

 

2. क्या पार्टियां एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए लोगों की जान का सहारा ले रही हैं ?

 

 

 

3. भारतीय खुफिया एजेसी पर हमेसा से ही सवाल उठाए जाते रहे हैं. तो क्या पटना के गांफी मैदान में हुए श्रृंखलाबद्ध विस्फोट भी भारतीय खुफिया एजेसी की विभलता का नतीजा है.

 

 

 

4. क्या यह विस्फोट नरेंद्र मोदी की उस सोच का नतीजा है जो उन्हें मुसलमानों का खलनायक बनाती है.

 

 

 

5. देश में आगामी चुनाव को देखते हुए, क्या इस हमले के पीछे आतंकवादियों का भी हाथ हो सकता है.

 

जरा सोचो और मुझे बताओ

 

आप के राय दे यहा

 

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विवेक कुमार सिंह

 

 

Just For a Gal- salmaan

Posted by VIVEK KUMAR SINGH on October 28, 2013 at 5:00 AM Comments comments (0)

सलमान अपनी जिंदगी में कुछ खास नियमों का पालन करते हैं यदि वो नियम टूट जाएं तो वो अपनी सीमाएं तोड़ने में जरा भी देर नहीं करते हैं. इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ. बिग बॉस शो को करोड़ों लोग देखते हैं केवल इसलिए नहीं कि बिग बॉस के घर में बॉलीवुड और टीवी दुनिया की कई शख्सियतों की निजी जिंदगी के बारे में बातें पता चलती हैं बल्कि इसलिए भी देखते हैं क्योंकि इस शो को सलमान खान होस्ट करते हैं.

 

 

salman khan in bigg bossजब सलमान खान ही यह कह दें कि वो अब बिग बॉस के शो को होस्ट नहीं करेंगे तो शायद इस शो को देखने वालों की कतार कम हो जाएगी. शनिवार की रात बिग बॉस शो को होस्ट करते समय सलमान खान ने कहा कि वह इस शो के अगले संस्करण में दिखायी नहीं देंगे. दरअसल सलमान खान को बिग बॉस के घर में बंद सदस्य कुशाल टंडन और तनीषा मुखर्जी के बीच का झगड़ा रास नहीं आ रहा था. कुशाल और तनीषा के बीच में पिछले कई एपीसोड से झगड़ा चल रहा था. लड़ते-लड़ते कुशाल की कई बार जुबान भी फिसल चुकी थी लेकिन शनिवार को प्रसारित हुए एपीसोड में जब कुशाल-तनीषा ने हद पार की तो सलमान के सब्र का बांध टूट गया और उन्होंने वह सब कह डाला जिसकी उम्मीद खुद शो वालों को नहीं थी.

 

 

 

सलमान ने गुस्से में कुशाल से यह तक कह डाला कि “यदि आप सोच रहे हैं कि यहां से जाने के बाद आप चुटकी बजाकर अपनी छवि सुधार लेंगे, तो आप गलत हैं और जो आप बार-बार घर से बाहर निकलने की बात करते हैं तो मैं आज आप के लिए बिग बॉस के घर के दरवाजे खुलवा देता हूं”. सलमान इतना कहने के बाद भी शांत नहीं हुए और उन्होंने गौहर खान को कहा कि ‘क्यों आप आप हमेशा कुशाल के झगड़ों में पड़ती है’. सलमान खान ने बिग बॉस के घर में बंद पुरुष सदस्यों को सलाह दी कि लड़कों को कभी भी लड़कियों के बीच में नहीं बोलना चाहिए. ऐसा करने से हमेशा झग़ड़े बढ़ते ही हैं.

Roti-???? ?? ??? ???-????

Posted by VIVEK KUMAR SINGH on October 21, 2013 at 7:35 AM Comments comments (0)

रोटी के लिए खरी-खोटी

साईं इतना दीजिए जामे कुटुम्ब समाय, मैं भी भूखा न रहूं साधु न भूखा जाय

-कबीर दास (भारतीय विचारक)

हम जानते हैं कि दुनिया में लंबे समय तक शांति नहीं रह सकती है क्योंकि एक तिहाई अघाए लोग हैं तो दो तिहाई भूखे

-जिमी कार्टर (पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति)

 

एक भूखा व्यक्ति सही या गलत नहीं देख सकता है। उसे सिर्फ भोजन दिखाई देता है

- पर्ल एस बक (विश्व प्रसिद्ध लेखिका)

 

आज के बाद हम सिर्फ यही चाहेंगे कि लोगों को पेट भरने का अधिकार मिले

-पाब्लो नेरुदा (नोबल विजेता चिली के साहित्यकार)

 

भगवान ने जो कुछ तुम्हें दिया है उसमें से जरूरत भर तुम ले लो। बाकी हिस्से की औरों को जरूरत है

- संत अगस्टाइन

 

यदि हम अंतरिक्ष पर विजय प्राप्त कर सकते हैं तो हम बच्चों में भुखमरी की समस्या को भी जीत सकते हैं

-बज एल्ड्रिन (चंद्रमा पर उतरने वाले दूसरे इंसान)

 

किसी को खाना देने पर लोग मुझे संत कहते हैं, लेकिन जब मैं भोजन न होने का कारण पूछता हूं तो वे मुझे वामपंथी कहते हैं

- आर्कबिशप डोम हेल्डर कामारा

…………

 

हमें भुखमरी के संरचनात्मक कारणों को खत्म करना होगा। इनमें से अधिकांश कृषि और प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन से जुड़े हुए हैं। अजीब विडंबना है। भुखमरी सूचकांक पर 63वें स्थान पर मौजूद देश को भूखे पेट विकासशील अर्थव्यवस्था वाली उपाधि से नवाजा जा सकता है।

 

दरअसल सदिच्छा के साथ नर्क का रास्ता प्रशस्त किया गया है। भुखमरी केवल भोजन की अनुपलब्धता का मसला नहीं है, यह हमारी नीतियों (सदिच्छा) की भी परिणति है। हालांकि जरूरतमंदों को खाद्यान्न मुहैया कराने में असफल रहने का हम बहुत संताप कर चुके हैं। मैं इसे इस समस्या की मूल वजह नहीं मानता हूं। जिस खाद्य कूपन प्रणाली से अमेरिका जैसा देश अपने भूखों की क्षुधा शांत करने में असफल रहा है। उसी प्रणाली को अपनाकर भारत तंत्र को दुरुस्त करने और भ्रष्टाचार के खात्मे का सपना संजोए हुए है। अब यह समझना जरूरी है कि हर महीने लोगों को एक निश्चित मात्रा में अनाज मुहैया कराकर भुखमरी को नहीं दूर किया जा सकता है।

 

भुखमरी को दूर करने को लेकर हमारे दृष्टिकोण में कुछ भयानक विसंगति है। खाद्य एवं कृषि मंत्रालय, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, ग्र्रामीण विकास मंत्रालय और बाल एवं महिला कल्याण मंत्रालयों द्वारा 22 राष्ट्रीय स्कीमें और कार्यक्रम इसके उन्मूलन को लेकर चलाए जा रहे हैं, फिर भी स्थिति संभलने की बजाय बढ़ रही है। पहले से ही चल रहे ऐसे प्रभावी कार्यक्रमों और हर साल उनके मद में किए जाने खर्चों में बढ़ोतरी के बावजूद गरीब भुखमरी की चपेट में हैं। इसलिए कुछ और ऐसी ही योजनाओं की शुरुआत निश्चित रूप से भूखे लोगों का भला करने वाली नहीं साबित हो सकती है।

 

भुखमरी के खात्मे के लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली द्वारा मुहैया कराए जाने वाले राशन से कुछ ज्यादा किए जाने की जरूरत है। हमें इसके संरचनात्मक कारणों को खत्म करना होगा जो इसका चेहरा और बिगाड़ रहे हैं। इनमें से अधिकांश कृषि और प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन से जुड़े हुए हैं। हमें अपने बुजुर्गों की बातों को नहीं भूलना चाहिए जो कहते थे कि ‘यदि आप किसी एक आदमी को एक दिन भोजन कराना चाहते हो तो उसे मछली दो लेकिन अगर किसी को जीवनभर भोजन कराना चाहते हो तो उसे मछली पकड़ना सिखाओ।’

 

यहीं पर हम विफल रहे हैं। प्रत्येक परिवार को प्रति माह 25 किग्र्रा अनाज देकर हम उन गरीब और भूखों को भुखमरी से लड़ने में आत्मनिर्भर नहीं बना रहे हैं। यहीं पर समस्या से निपटने को लेकर हमारे दृष्टिकोण में मूल रूप से बदलाव की जरूरत है। जब तक खाद्य सुरक्षा कृषि से नहीं जुड़ेगी और जब तक खाद्य सुरक्षा को ध्यान में रखकर अंतरराष्ट्रीय व्यापार, ग्र्रामीण विकास, जल प्रबंधन और विज्ञान व तकनीक से संबंधित नीतियां नहीं अपनाई जाएंगी, भुखमरी को इतिहास नहीं बनाया जा सकेगा।

 

एक खास कार्ययोजना के द्वारा ब्राजील 2015 तक भुखमरी को खत्म करने जा रहा है। अब समय आ चुका है। भारत को भी शून्य भुखमरी कार्यक्रम को प्रतिपादित करना चाहिए। यह केवल अलग दृष्टिकोण अपनाकर ही संभव है। हमें इसमें कोई कारण नहीं समझ में आता कि गांव में किसी को क्यों भूखे रहना पड़ रहा है, जहां साल दर साल देश के लिए पर्याप्त खाद्यान्न का उत्पादन किया जा रहा है। स्थानीय स्तर पर सामुदायिक खाद्य अनाज बैंक स्कीम को अपनाकर हमारे 6.5 लाख गांव खाद्य सुरक्षा के मामले में आत्मनिर्भर हो सकते हैं। मैं ऐसे सौ से ज्यादा गांवों को जानता हूं जहां ऐसी ही योजना के बूते भुखमरी को पूरी तरह से खत्म करने में मदद मिली है। केवल जल संरक्षण से ही महाराष्ट्र की हिब्रे बाजार एक सूखाग्र्रस्त गांव से आज एक चमकते बाजार केंद्र में तब्दील हो चुका है। आज अकेले इस गांव में 60 करोड़पति पैदा हो चुके हैं। ऐसी व्यवस्था में स्थानीय उत्पादन, स्थानीय भंडारण और स्थानीय वितरण होता है। यह केवल तभी संभव है जब गांव के समुदायों को वहां की जमीन और जल जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण हासिल होता है।

 

शून्य भुखमरी के लिए प्रस्तावित छह सूत्रीय कार्यक्रम

† किसी भी कृषि योग्य जमीन का गैर कृषि वाले उद्देश्यों की पूर्ति के लिए नहीं किया जाना चाहिए।

† कृषि को टिकाऊपन के आधार पर पुनर्जीवित करने की जरूरत है।

† न्यूनतम समर्थन मूल्य को शामिल करते हुए किसानों को हर महीने एक निश्चित आय मुहैया कराया जाना चाहिए। गरीब परिवार के लिए छोटे ऋणों पर कम ब्याज दर वसूली जानी चाहिए।

 

† अंत्योदय परिवारों को छोड़कर सार्वजनिक वितरण प्रणाली को भंग कर देना चाहिए। इसके स्थान पर बिहार और पूर्वी भारत के गांवों में चलाए जा रहे परंपरागत खाद्यान्न बैंकों की प्रणाली अपनायी जाए

† खाद्यान्न निर्यात की अनुमति तभी दी जाए जब देश के सभी लोगों का पर्याप्त रूप से पेट भरा हुआ हो।

† मुक्त व्यापार समझौतों समेत अंतरराष्ट्रीय व्यापार को घरेलू कृषि और खाद्य सुरक्षा के साथ खिलवाड़ की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। खाद्यान्न का आयात बेरोजगारी के आयात जैसा होता है।

आमूलचूल बदलाव की जरूरत

 

-Vivek Singh


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Mahashakti Aur Bhukmari

Posted by VIVEK KUMAR SINGH on October 21, 2013 at 7:30 AM Comments comments (0)

भुखमरी ने अमेरिका में 24 साल के रिकॉर्ड को तोड़ दिया है। चार में से एक आदमी गरीब और सात में से एक व्यक्ति भूखे पेट सोने को बेबस है। करीब 32 करोड़ की आबादी में यहां 4.7 करोड़ लोग भुखमरी के शिकार हैं। अटलांटिक महासागर से सटे हुए समृद्ध यूरोपीय संघ में 12 करोड़ लोग भुखमरी से जूझ रहे हैं। सबसे चकित करने वाली बात यह है कि भारत में लागू नए खाद्य सुरक्षा कानून के तहत यहां प्रत्येक व्यक्ति को सालाना 60 किग्र्रा अनाज मुहैया कराए जाने का प्रावधान है जबकि अमेरिका डेयरी उत्पादों और प्रसंस्कृत खाद्य समेत लोगों को 358 किग्र्रा खाद्यान्न मुहैया करा रहा है।

 

खाद्य सुरक्षा कानून से उम्मीदें

भुखमरी की हालत को सुधारने में खाद्य सुरक्षा कानून एक जरिया बन सकता है, मगर अभी यह भुखमरी खत्म करने में पर्याप्त क्षमतावान नहीं दिखाई देता है। हमें खाद्य सुरक्षा का और अधिक मजबूत और प्रभावी क्रियान्वयन चाहिए जो वाकई देश को भूख से मुक्ति दिला सके।

सवाल यह है कि ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत की गंभीर स्थिति को क्या खाद्य सुरक्षा कानून सुधार सकता है? इसका जवाब निश्चित रूप से हां ही हो सकता है क्योंकि हमारे गोदामों में जमा स्टॉक से इस वर्ष के लिए हमें 64 मिलियन टन अनाज की ही जरूरत पड़ेगी, इसके बाद भी हमारे पास 16 मिलियन टन अनाज बचा रहेगा। क्या यह अच्छा नहीं होगा कि गोदामों में पड़े-पड़े अनाज सड़ जाए, उसे चूहे खाए, इसके बजाय वह लोगों के पेट तक जाए, गरीब तक पहुंचे और बंटे?

 

कई लोगों का मत है कि यह फायदा कभी भी पात्र लोगों तक नहीं पहुंचेगा, लेकिन तमिलनाडु , छत्तीसगढ़, ओडिशा तथा आंध्रप्रदेश जैसे राज्यों द्वारा सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिये जनता तक अनाज पहुंचाने के कार्यक्रम सफलतापूर्वक चलाया जा रहा है। वे अपनी राजनीतिक इच्छाशक्ति के जरिए कामयाब हुए हैं।

 

अब खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत देश की 67 प्रतिशत जनता इसके दायरे में आई है, विभिन्न राज्य सरकारें उसमें अपना अंश जोड़कर लगभग सार्वभौमिक करने के आस-पास पहुंच गई है, पर अब भी हमारा मानना है कि इसे ठीक से लागू करने के लिए एक मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है, भले ही बिल आनन- फानन में लाया गया हो मगर उसकी प्रभावी पालन सुनिश्चित करने के लिए व्यवस्था बैठाई जानी बहुत जरूरी है, जो राज्य इससे थोड़ा बहुत असहमति व्यक्त करते है उन्हें भी अब इसे पूरे मन से लागू करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए ताकि देश से भुखमरी जैसी समस्या को जड़मूल से नष्ट किया जा सके।

 

अभी मात्र 25 किलो अनाज प्रति परिवार दे रहे है, यह वाकई कम है, इससे दोगुने की तुरंत आवश्यकता है, हमें यह भी मानना होगा कि केवल अनाज देने से भुखमरी और कुपोषण से यह देश मुक्त नहीं हो सकता है, जैसा कि तमिलनाडु, केरल जैसे राज्य तेल व दाल दे रहे है और राजस्थान के बारां जिले की आदिम सहरिया जन जाति को मुफ्त फूड पैकेज दिए हैं जिसमें दाल, तेल, अनाज इत्यादि होते है, उसी प्रकार का संपूर्ण पोषण युक्त खाद्यान्न की सुरक्षा सबको दी जा सके तो अच्छा होगा।

-अरुणा रॉय/भंवर मेघवंशी (लेखकद्वय मजदूर किसान शक्ति संगठन के साथ कार्यरत हैं।)

…………..

नीति के साथ नियंता भी सुधरें

विवेक कुमार सिंह

(खाद्य एवं जन स्वास्थ्य कार्यकर्ता)

तमाम प्रयासों के बावजूद बदस्तूर जारी भुखमरी इन सरकारी योजनाओं पर सवाल खड़े करती है। यदि ये कुछ खास अंतर लाने में समर्थ नहीं हैं तो क्या इन्हें जारी रखा जाना चाहिए?

 

वैश्विक भुखमरी सूचकांक ने एक बार फिर देश में व्याप्त भुखमरी और कुपोषण की गंभीर परिस्थितियों को उजागर किया है। विगत दो दशकों की टिकाऊ आर्थिक वृद्धि, पर्याप्त कृषि उत्पादन और गोदामों में गेहूं, चावल के रिकॉर्ड भंडारण के बावजूद इस तरह के हालात शर्मनाक हैं। देश में इन समस्याओं से निपटने के लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस), एकीकृत बाल विकास कार्यक्रम (आइसीडीएस) और स्कूल मील जैसी योजनाओं का लंबा अतीत रहा है। हाल में पारित राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा एक्ट (एनएफएसए) इसी दिशा में अगला प्रयास है। इन सब प्रयासों के बावजूद लगातार जारी ऐसी परिस्थितियां इन सरकारी योजनाओं पर सवालिया निशान खड़े करती हैं। सवाल उठते हैं कि यदि ये कुछ खास अंतर लाने में समर्थ नहीं है तो ऐसी योजनाओं को क्या जारी रखना चाहिए? यद्यपि इस तरह के तर्क घातक हैं क्योंकि इनसे परिस्थितियां सुधरने के बजाय बदतर ही होंगी।

 

सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि ये कार्यक्रम कभी सुचारु रूप से चल ही नहीं पाए। मसलन पीडीएस जो पहले सार्वभौमिक योजना थी उसको 1997 में लक्षित लोगों के लिए तब्दील किया गया। इसमें गरीबों को पहचानने में समस्याएं देखी गईं। दरअसल सर्वे दर सर्वे बताते हैं कि गरीबी की व्यापक प्रकृति और हमारे अत्यधिक असमान समाज के कारण यह सुनिश्चित कर पाना असंभव है कि समाज कल्याण योजनाओं के लिए वास्तविक गरीब कौन है। नतीजतन कई ऐसे लोग जो वास्तव में गरीब हैं लेकिन वे गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) की सूची में शामिल नहीं हैं। नेशनल सैंपल सर्वे (एनएसएस) डाटा के अनुसार करीब 50 प्रतिशत गरीबों के पास बीपीएल कार्ड नहीं है। इसके अलावा राजनेताओं, अफसरों और दुकानदारों की साठगांठ के चलते इस तंत्र में बड़े पैमाने पर लीकेज व्याप्त है। पूरे पीडीएस में 40 प्रतिशत से भी ज्यादा का लीकेज है। इसका यह आशय भी नहीं है कि समस्या का समाधान नहीं निकाला जा सकता। भारत जैसे देश में अलग-अलग राज्यों में भिन्नताएं देखने को मिलती हैं। कुछ राज्यों में इस तंत्र को प्रभावी तरीके से लागू किया है और उनसे बहुत कुछ सीखा जा सकता है।

 

दक्षिणी राज्यों केरल, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश एवं हाल के वर्षों में अच्छा प्रदर्शन करने वाले छत्तीसगढ़, ओडिशा और राजस्थान के अनुभव बताते हैं कि पीडीएस में इस तरह से सुधार की गुंजाइश है कि लोगों को नियमित रूप से अनाज मिलता रहे और न्यूनतम लीकेज हो। इन राज्यों में जो सबसे आम गुण पाए गए उनमें लगभग सार्वभौमिक स्तर तक विस्तार, कंप्यूटरीकरण, राशन की दुकानों को निजी हाथों से लेना, अनाज की दरवाजे तक डिलीवरी, प्रभावी शिकायत निवारण केंद्र और पारदर्शी एवं जवाबदेही उपाय हैं। एनएफएसए ने इन सुधारों को पूरे देश में लागू करने का रास्ता खोल दिया है। लोगों और सिविल सोसायटी की सतत निगरानी के माध्यम से इस कानून के प्रावधानों का उपयोग कर यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि देश में भुखमरी और कुपोषण की स्थिति से मुक्ति पाई जा सके।

 

यद्यपि यह ध्यान रखने की जरूरत है कि भुखमरी और कुपोषण को खत्म करने के लिए अनाज आधारित पीडीएस प्रणाली पहला कदम ही है। टिकाऊ बदलाव के लिए हमको अधिक समान आर्थिक मॉडल की जरूरत है जहां वृद्धि को समान तरीके से बांटा जाए और लोगों के संसाधन और जीविकोपार्जन की सुरक्षा की जा सके। कामगारों के लिए न्यूनतम मजदूरी और किसानों के लिए लाभकारी कीमतें सुनिश्चित की जानी चाहिए। ऐसे कदम उठाए जाने की दरकार है ताकि वर्तमान अनाज आधारित आहार के दायरे को बढ़ाकर उनमें दालें, तेल, सब्जियां, फल और जन्तु प्रोटीन को भी शामिल किया जा सके। इसके साथ ही महिलाओं और बच्चों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। इन सब उपायों को करने के बाद ही कुपोषण के खिलाफ वास्तविक लड़ाई संभव हो सकेगी।

 

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Vegetarianism

Posted by VIVEK KUMAR SINGH on October 17, 2013 at 5:30 PM Comments comments (0)

On the spiritual path those who are the most inclined to lead a peaceful existence that respects the value of all life often adopt the vegetarian lifestyle. For some people this is a very big step. This is in accordance with the yogic principle of ahimsa, which is to observe nonviolence and abstain from injuring any being in any way. However, many people ask what about the plants that are killed in the process of cooking vegetarian foods. Don’t they suffer? And don't we get reactions for that?

The basic law of nature is that every living being lives off the weaker living entities. But there is a way of living so that we all can benefit, that we all make spiritual development. And this spiritual lifestyle is a way in which that can happen. The way this works is in the process of bhakti-yoga, wherein devotion goes beyond simple vegetarianism, and food becomes a method of spiritual progress for both those who prepare and eat the food, and those living beings that are used in the preparations.

For example, in the Krishna temples, food is offered to the Deities in a special sacrament, after which it becomes prasadam. This means the mercy of the Lord. Thus, the food we eat after it is offered to the Lord becomes a means for our purification and spiritual development.

In the Bhagavad-gita Lord Krishna says, “All that you do, all that you eat, all that you offer and give away, as well as all austerities that you may perform, should be done as an offering toMe.” So, offering what we eat to the Lord is an integral part of bhakti-yoga and makes the food blessed with spiritual potencies.

The Lord also describes what He accepts: “If one offers Me with love and devotion a leaf, a flower, fruit or water, I will accept it.” Thus, we can see that the Lord does not need anything, but if one offers fruits, grains, and vegetarian foods, He will accept it. The Lord does not accept foods like meat, fish, or eggs, but only those that are pure and naturally available without harming others. So, we offer what Lord Krishna likes, not those items which are distasteful to Him. We also do not use garlic, onions, or mushrooms when we prepare food for Krishna, for these are considered to invoke passion or are from impure sources, which similarly affect our consciousness. Foods for Krishna should be in the mode of goodness, sattvic foods which when we accept asprasadam also elevate our own consciousness.

So, on the spiritual path, eating food that is first offered to God is the ultimate perfection of a vegetarian diet. The Vedic literature explains that the purpose of human life is reawakening the soul’s original relationship with God, and accepting prasadam is one of the ways to help us reach that goal.

The food is meant to be cooked with the consciousness of love, knowing that it will be offered to Lord Krishna first, and only after that distributed to ourselves or guests to take. The ingredients are selected with great care and must be fresh, clean and pure vegetarian. Also, in cooking for Krishna we do not taste the preparations while cooking. We leave the first taste for Krishna when it is offered to Him.

After all the preparations are ready, we take a portion of each one and place it in bowls on a special plate that is used for this purpose only and take it to the altar to offer it to the Deities or pictures of Krishna.

Then the preparations are presented with special prayers as we ask that God accept our humble offering. The most important part of the offering is the love with which it is given, and then the Lord accepts it. God does not need to eat, but it is our love for God which attracts Him to us and to accept our offering. Even if the most sumptuous banquet is offered to God but without devotion and love, Krishna will not be hungry to accept it. It is our love, our devotion and bhakti, which catches the attention of Lord Krishna who is then inclined to accept our service.

After He glances over and tastes the loving offering of vegetarian preparations, He leaves the remnants of the food offerings for us to honor and relish. Krishna’s potency is absorbed in that food. In this way, material substance becomes spiritualized, which then affects our body and mind in a similar and most positive and elevating way. This is His special mercy for us. Thus, the devotional process becomes an exchange of love between us and God, which includes food. And that food not only nourishes our body, but also spiritualizes our mind and consciousness.

By relishing the sacred food of Krishna prasadam, it purifies our heart and protects us from falling into illusion. In this way, the devotee imbibes the spiritual potency of Lord Krishna and becomes cleansed of sinful reactions by eating food that is first offered in sacrifice to God. We thus also become free from reincarnation, the continued cycle of birth and death. This process prepares us for entering the spiritual world since the devotees there also relish eating in the company of Lord Krishna.

However, what does this do for the plants that are offered? They are also living beings. In this process, not only do we make advancement, but all of the plants that are used in the preparations as an offering to God are also purified and reap spiritual benefit. They are used and offered to God and thus make progress in the same way we do. That is why this is beyond mere vegetarianism in which we may live more simply and nonviolently, but in this process, everything we use in the service of the Lord becomes spiritualized.

If we merely cook for ourselves, we become implicated in karma or the reactions if we cause the harm of any living being, even plants. The vegetarian lifestyle surely causes less karma than the unnecessary slaughtering of innocent animals. However, the system of first offering food to the Lord and then taking prasadam becomes the perfect yoga diet and frees us from such karma.

Therefore, the cooking, the offering, and then the respectful eating or honoring of this spiritualized food all become a part of the joyful process of devotional service to the Lord. Anyone can learn to do this and enjoy the happiness of experiencing the potency of Krishna prasadam.

Hare Krishna


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